...ॐ...

ऋग्वेद

मण्डल एक

 
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सूक्त 1 से 5 तक--
 1
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं रत्वीजम | होतारं रत्नधातमम ||
अग्निः पूर्वेभिर्र्षिभिरीड्यो नूतनैरुत | स देवानेह वक्षति ||
अग्निना रयिमश्नवत पोषमेव दिवे-दिवे | यशसं वीरवत्तमम ||
अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि | स इद्देवेषु गछति ||
अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः | देवो देवेभिरा गमत ||
यदङग दाशुषे तवमग्ने भद्रं करिष्यसि | तवेत तत सत्यमङगिरः ||
उप तवाग्ने दिवे-दिवे दोषावस्तर्धिया वयम | नमो भरन्त एमसि ||
राजन्तमध्वराणां गोपां रतस्य दीदिविम | वर्धमानंस्वे दमे ||
स नः पितेव सूनवे.अग्ने सूपायनो भव | सचस्वा नः सवस्तये ||
2
वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंक्र्ताः | तेषां पाहि शरुधी हवम ||
वाय उक्थेभिर्जरन्ते तवामछा जरितारः | सुतसोमा अहर्विदः ||
वायो तव परप्र्ञ्चती धेना जिगाति दाशुषे | उरूची सोमपीतये ||
इन्द्रवायू इमे सुता उप परयोभिरा गतम | इन्दवो वामुशन्ति हि ||
वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू | तावा यातमुप दरवत ||
वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्क्र्तम | मक्ष्वित्था धिया नरा ||
मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम | धियं घर्ताचीं साधन्ता ||
रतेन मित्रावरुणाव रताव्र्धाव रतस्प्र्शा | करतुं बर्हन्तमाशाथे ||
कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया | दक्षं दधाते अपसम ||
3
अश्विना यज्वरीरिषो दरवत्पाणी शुभस पती | पुरुभुजाचनस्यतम ||
अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया | धिष्ण्या वनतं गिरः ||
दस्रा युवाकवः सुता नासत्या वर्क्तबर्हिषः | आ यातंरुद्रवर्तनी ||
इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे तवायवः | अण्वीभिस्तना पूतासः ||
इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः | उप बरह्माणि वाघतः ||
इन्द्रा याहि तूतुजान उप बरह्माणि हरिवः | सुते दधिष्वनश्चनः ||
ओमासश्चर्षणीध्र्तो विश्वे देवास आ गत | दाश्वांसो दाशुषः सुतम ||
विश्वे देवासो अप्तुरः सुतमा गन्त तूर्णयः | उस्रा इवस्वसराणि ||
विश्वे देवासो अस्रिध एहिमायासो अद्रुहः | मेधं जुषन्त वह्नयः ||
पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती | यज्ञं वष्टु धियावसुः ||
चोदयित्री सून्र्तानां चेतन्ती सुमतीनाम | यज्ञं दधे सरस्वती ||
महो अर्णः सरस्वती पर चेतयति केतुना | धियो विश्वा वि राजति ||
4
सुरूपक्र्त्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे | जुहूमसि दयवि-दयवि ||
उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब | गोदा इद रेवतोमदः ||
अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम | मा नो अति खय आगहि ||
परेहि विग्रमस्त्र्तमिन्द्रं पर्छा विपश्चितम | यस्ते सखिभ्य आ वरम ||
उत बरुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत | दधाना इन्द्र इद दुवः ||
उत नः सुभगानरिर्वोचेयुर्दस्म कर्ष्टयः | सयामेदिन्द्रस्य शर्मणि ||
एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नर्मादनम | पतयन मन्दयत्सखम ||
अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वर्त्राणामभवः | परावो वाजेषु वाजिनम ||
तं तवा वाजेषु वाजिनं वाजयामः शतक्रतो | धनानामिन्द्र सातये ||
यो रायो.अवनिर्महान सुपारः सुन्वतः सखा | तस्मा इन्द्राय गायत ||
5
आ तवेता नि षीदतेन्द्रमभि पर गायत | सखाय सतोमवाहसः ||
पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम | इन्द्रं सोमे सचा सुते ||
स घा नो योग आ भुवत स राये स पुरन्ध्याम | गमद वाजेभिरा स नः ||
यस्य संस्थे न वर्ण्वते हरी समत्सु शत्रवः | तस्मा इन्द्राय गायत ||
सुतपाव्ने सुता इमे शुचयो यन्ति वीतये | सोमासो दध्याशिरः ||
तवं सुतस्य पीतये सद्यो वर्द्धो अजायथाः | इन्द्र जयैष्ठ्याय सुक्रतो ||
आ तवा विशन्त्वाशवः सोमास इन्द्र गिर्वणः | शं ते सन्तु परचेतसे ||
तवां सतोमा अवीव्र्धन तवामुक्था शतक्रतो | तवां वर्धन्तु नो गिरः ||
अक्षितोतिः सनेदिमं वाजमिन्द्रः सहस्रिणम | यस्मिन विश्वानि पौंस्या ||
मा नो मर्ता अभि दरुहन तनूनामिन्द्र गिर्वणः | ईशानो यवया वधम ||
हिंदी अर्थ---
हम लोग विद्वानों के सत्कार संगम महिमा और कर्म के देने तथा ग्रहण करने वाले, उत्पत्ति के समय से पहले परमाणु आदि सृष्टि के धारण करने और और बारम्बार उत्पत्तिके समय में स्थूल सृष्टि के रचने वाले तथा ऋतु ऋतु में उपासना करने योग्य और निश्चय करके मनोहर पृथ्वी या सुवर्ण आदि रत्नों के धारण करने व देने तथा सब पधार्थों के प्रकाश करने वाले की स्तुति करते हैं.
तथा उपकार के लिए हम लोग विद्यादी दान और शिल्पक्रियाओं से उत्पन्न करने योग्य पदार्थों के देने हरे तथा उन पधार्थों के उत्पन्न करने के समय से पूर्व भी छेदन धारण और आकर्षण आदि गुणों के धारण करने वाले शिल्प विद्या साधनों के हेतु अछे अछे सुवर्ण आदि रत्नों के धारण कराने तथा युद्ध आदि कोण में कलायुक्त शस्त्रों से विजय कराने हरे भोइतिक अग्नि की बारम्बार इच्छा करते हैं.
यहाँ अग्नि शब्द के दो अर्थ करने में प्रमाण ये हैं कि इस ऋग्वेद के मन्त्र से यह जाना जाता ह की एक सद ब्रह्मा के इंद्रा आदि अनेक नाम हैं . तथा इस य्गुर्वेद के मन्त्र से भी अग्नि आदि नामों करके सच्चिदानन्दआदि लक्षणों वाले ब्रह्मा को जानना चाहिय.सत्पथ ब्राह्मणों के प्रमाणों से अग्नि शब्द ब्रह्मा और आत्मा इन दो अर्थों का वाची ह. इस प्रमाण में अग्नि शब्द से प्रजा शब्द करके भोतिक और प्रजापति शब्द से ईश्वरका ग्रहण होता है.
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